श्री गणेश चालीसा के बारे में
श्री गणेश चालीसा भगवान गणेश की स्तुति में रचित एक पावन स्तोत्र है, जिन्हें विघ्नहर्ता और किसी भी शुभ कार्य से पूर्व सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देव माना जाता है। इस चालीसा में गणेश जी के जन्म की सुंदर कथा वर्णित है — माता पार्वती के पुत्र के रूप में उनका प्राकट्य, शनिदेव की अशुभ दृष्टि से शिशु का सिर विलुप्त होना, भगवान विष्णु द्वारा गज (हाथी) का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित करना, तथा बालक गणेश का पृथ्वी की परिक्रमा के स्थान पर अपने माता-पिता की परिक्रमा कर बुद्धिमत्तापूर्वक “प्रथम पूज्य” का पद प्राप्त करना। नीचे आप संपूर्ण चालीसा, उसका अर्थ, लाभ और पाठ की विधि पढ़ सकते हैं।
श्री गणेश चालीसा — सम्पूर्ण पाठ
॥ दोहा ॥
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभः काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मुषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुची पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
अतिथि जानी के गौरी सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कही अन्तर्धान रूप हवै।
पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढायो।
उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥
कहत लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यौ कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटी चक्र सो गज सिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीना पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
॥ दोहा ॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
गणेश चालीसा का अर्थ
यह चालीसा भगवान गणेश के जन्म की प्रिय कथा सुनाती है। माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की, और गणेश जी ब्राह्मण अतिथि के वेश में प्रकट होकर उन्हें अत्यंत बुद्धिमान पुत्र का वरदान दिया। जब शिशु का जन्म हुआ, तो सभी देवता उन्हें देखने आए किंतु शनिदेव अपनी अशुभ दृष्टि के भय से देखने में संकोच करने लगे। माता पार्वती के आग्रह पर जब शनिदेव ने बालक को देखा, तो उनकी प्रबल दृष्टि से शिशु का सिर विलुप्त हो गया। उस शोक के समय भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर आए और गज का सिर लाकर बालक को पुनः जीवित किया और इस प्रकार वे गजानन कहलाए, समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य। चालीसा यह भी बताती है कि बालक गणेश ने अपनी बुद्धि कैसे सिद्ध की: जब उन्हें संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा की चुनौती दी गई, तो उन्होंने केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा कर यह घोषित किया कि वही उनका सम्पूर्ण संसार हैं और इस प्रकार उन्होंने “प्रथम पूज्य” का पद प्राप्त किया।
गणेश जी के शीश परिवर्तन की कथा के विभिन्न रूप
गणेश जी के जन्म और उनके शीश परिवर्तन की कथा अलग-अलग पुराणों में भिन्न रूपों में मिलती है। शिव पुराण में प्रसिद्ध कथा है कि माता पार्वती के आदेश पर द्वार की रक्षा करते हुए गणेश जी का भगवान शिव से संघर्ष हुआ और शिव जी ने उनका शीश काट दिया। वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड में शनि देव की दृष्टि पड़ने से गणेश जी का शीश अलग होने की कथा वर्णित है। दोनों ही कथाएँ पुराणिक परंपरा में मान्य हैं — इस चालीसा में शनि देव की दृष्टि वाली कथा का उल्लेख है, जो ब्रह्मवैवर्त पुराण की परंपरा पर आधारित है। दोनों कथाओं में अंततः भगवान विष्णु द्वारा गज का सिर लगाकर गणेश जी को पुनर्जीवित किया जाता है।
✨ पाठ के लाभ
- नियमित पाठ से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और शुभ आरंभ होता है।
- किसी भी नए कार्य, यात्रा या व्यवसाय के आरंभ से पूर्व पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
- मान्यता है कि इससे घर में बुद्धि, समृद्धि और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।
🪔 पाठ की विधि
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख दीपक जलाएँ
- लाल पुष्प, दूर्वा और मोदक अथवा लड्डू का प्रसाद अर्पित करें
- “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 11 या 21 बार जप करें।
- शांत और एकाग्र मन से गणेश चालीसा का पाठ करें।
- अंत में गणेश जी की आरती कर प्रसाद वितरित करें।
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प्रश्न-उत्तर
भगवान गणेश का सिर हाथी का क्यों है?
इस चालीसा के अनुसार, जब शनिदेव की अशुभ दृष्टि से शिशु का सिर विलुप्त हो गया, तब भगवान विष्णु ने गज (हाथी) का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया।
गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों की जाती है?
गणेश जी ने पृथ्वी की परिक्रमा के स्थान पर अपने माता-पिता की परिक्रमा कर यह सिद्ध किया कि उनके लिए माता-पिता ही सर्वोपरि हैं और इसी बुद्धिमत्ता से उन्होंने “प्रथम पूज्य” का पद प्राप्त किया।
गणेश चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?
विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि बढ़ती है, कार्यों में सफलता मिलती है तथा घर में सुख-समृद्धि आती है।
गणेश चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है; विशेष रूप से बुधवार, गणेश चतुर्थी तथा किसी भी नए कार्य के आरंभ से पूर्व पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।