ॐ जय अम्बे गौरी आरती – बोल, अर्थ व महत्व

ॐ जय अम्बे गौरी आरती के बारे में

नवरात्रि की शाम हो और घर-घर से “ॐ जय अम्बे गौरी” की आवाज़ न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है। यह माँ दुर्गा की सबसे प्रिय और सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती है। इसमें माँ को अम्बे, गौरी और श्यामा कहकर पुकारा गया है। एक ओर इसमें माँ के ममता भरे, सुंदर रूप का वर्णन है, तो दूसरी ओर उस रूप का भी, जिसने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और चण्ड-मुण्ड जैसे असुरों का संहार किया।

आरती की अंतिम पंक्ति में इसके रचयिता का नाम आता है, शिवानंद स्वामी। पीढ़ियों से यह आरती मंदिरों और घरों में रोज़ गाई जा रही है। इसकी धुन इतनी सरल है कि बच्चे भी दो-तीन बार सुनकर इसे गाने लगते हैं। नीचे पूरी आरती, उसका अर्थ और घर पर आरती करने की आसान विधि दी गई है।

ॐ जय अम्बे गौरी आरती

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।

उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।

रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।

सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।

कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती।

धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।

आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।

बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।

भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।

मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥


श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।

कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावै॥


॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी आरती का अर्थ

आरती की शुरुआत में माँ अम्बे को गौरी और श्यामा कहकर उनकी जय-जयकार की गई है। माँ वही देवी हैं जिनका ध्यान विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी दिन-रात करते हैं। इसके बाद माँ के रूप का सुंदर वर्णन आता है: मांग में सिंदूर, माथे पर कस्तूरी का टीका, चमकते नेत्र और चंद्रमा जैसा मनोहर मुख। उनका शरीर सोने की तरह दमकता है, वे लाल वस्त्र पहनती हैं और गले में लाल फूलों की माला सजी है। माँ सिंह पर सवार हैं, हाथों में खड्ग और खप्पर हैं, और देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी उनकी सेवा करते हैं, क्योंकि वही सबके दुख हरती हैं।

आरती के बीच के पदों में माँ की विजयों का वर्णन है। उन्होंने शुंभ-निशुंभ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का संहार किया और मधु-कैटभ का अंत करके देवताओं को भय से मुक्त किया। वही ब्रह्माणी हैं, रुद्राणी हैं, कमला हैं और शिव की पटरानी हैं, जिनका गुणगान वेद और शास्त्र करते हैं। चौंसठ योगिनियाँ उनके लिए मंगल गीत गाती हैं और भैरव ढोल-मृदंग और डमरू की ताल पर नृत्य करते हैं। अंत में भक्त माँ को पूरे जगत की माता और पालनहार कहता है, जो दुख हरती हैं और सुख-संपत्ति देती हैं। शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो भी प्रेम से यह आरती गाता है, उसे सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

ॐ जय अम्बे गौरी आरती के लाभ

  • मन से भय और नकारात्मकता दूर होती है, और भीतर साहस व शक्ति आती है।
  • नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार के दिन इसे गाना विशेष शुभ माना जाता है।
  • मान्यता है कि यह आरती परिवार को संकटों से बचाती है और घर में सुख-समृद्धि लाती है।
  • रोज़ शाम दीया जलाकर गाने से घर का वातावरण शांत और भक्तिमय बनता है।
  • भक्त को माँ के उस ममतामयी रूप का अनुभव होता है, जो हर पुकार सुनती है और रक्षा करती है।

🪔 आरती करने की विधि

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने शांत मन से बैठें।
  2. घी का दीया जलाएँ। कपूर, लाल फूल, कुमकुम और थोड़ा प्रसाद (हलवा, फल या मिठाई) पास रख लें।
  3. माँ को फूल अर्पित करें और कुमकुम का तिलक लगाएँ।
  4. घंटी बजाते हुए “ॐ जय अम्बे गौरी” गाना शुरू करें और आरती की थाली को माँ के सामने धीरे-धीरे घड़ी की दिशा में घुमाएँ।
  5. आरती पूरी होने पर दोनों हथेलियों से दीये की लौ की गर्माहट आँखों पर लगाएँ। फिर सबको आरती दें और प्रसाद बाँटें।

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प्रश्न-उत्तर

ॐ जय अम्बे गौरी आरती कब गाई जाती है?

नवरात्रि के नौ दिनों में, हर शुक्रवार, दुर्गा अष्टमी पर और किसी भी देवी पूजा के अंत में यह आरती गाई जाती है। कई घरों में इसे रोज़ संध्या के समय भी गाया जाता है।

यह आरती किस देवी को समर्पित है?

यह आरती माँ दुर्गा को समर्पित है, जिन्हें इसमें अम्बे, गौरी और श्यामा कहा गया है। आरती में उन्हें ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला भी कहा गया है, यानी देवी के सभी रूप एक ही माँ के रूप हैं।

ॐ जय अम्बे गौरी और अम्बे तू है जगदम्बे में क्या अंतर है?

दोनों माँ दुर्गा की आरतियाँ हैं। ॐ जय अम्बे गौरी में माँ के सौंदर्य और असुरों पर उनकी विजय का वर्णन है, जबकि अम्बे तू है जगदम्बे काली एक बच्चे की अपनी माँ से भावुक पुकार जैसी है। बहुत से लोग दोनों आरतियाँ साथ में गाते हैं।

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